ग़ज़ल
इस दिल में एक दो बस
अरमान रह गये हैं
दिल के मकां में अब
ये महमान रह गए हैं
ख़ुद को हूँ जिसने
चाहा आगे निकल गया वो
दुनिया की फ़िक्र
करते नादान रह गए हैं
आने को है क़यामत
बेबस है क्या करे वो
दुनिया में
इक्का-दुक्का इंसान रह गए हैं
कुछ सीख होशियारी
,कुछ सीख दुनियादारी
क्यों अब ख़याल उसका
आता नहीं है मन में
गुल ले गये हैं
ताज़िर,गुलदान रह गये हैं
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