ग़ज़ल
मिली तो है हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
भली लगी है ज़िन्दगी कभी–कभी ज़रा-ज़रा
तमाम काम छोड़कर तेरी गली को चल दिए
वहीं मिली हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
तेरे ख़याल क्या कहूँ हैं जुगनुओं के झुंड से
सियाह रात रौशनी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
है आग के सफ़र में जो लबों पे मेरे तिश्नगी
बुझी तो है मगर बुझी कभी–कभी ज़रा-ज़रा
ग़मों से की है दिल-लगी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
मिली तो है हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
भली लगी है ज़िन्दगी कभी–कभी ज़रा-ज़रा
तमाम काम छोड़कर तेरी गली को चल दिए
वहीं मिली हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
तेरे ख़याल क्या कहूँ हैं जुगनुओं के झुंड से
सियाह रात रौशनी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
है आग के सफ़र में जो लबों पे मेरे तिश्नगी
बुझी तो है मगर बुझी कभी–कभी ज़रा-ज़रा
किसी फ़क़ीर की तरह ग़मों पे हँस दिए "ख़याल"
ग़मों से की है दिल-लगी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
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