Wednesday, 4 January 2023

ग़ज़ल -30 -मिली तो है हमें खुशी- उड़ान *

 

ग़ज़ल

 

मिली तो है हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा 

भली लगी है ज़िन्दगी  कभी–कभी ज़रा-ज़रा 

 

तमाम काम छोड़कर तेरी गली को चल दिए

वहीं मिली हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा


तेरे ख़याल क्या कहूँ हैं  जुगनुओं के झुंड से

सियाह रात रौशनी कभी-कभी ज़रा-ज़रा 

 

है आग के सफ़र में जो लबों पे मेरे तिश्नगी

बुझी तो है मगर बुझी कभी–कभी ज़रा-ज़रा 

 किसी फ़क़ीर की तरह ग़मों पे हँस दिए "ख़याल"

ग़मों से की है दिल-लगी कभी-कभी ज़रा-ज़रा

 

 

 ग़ज़ल


मिली तो है हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा
भली लगी है ज़िन्दगी कभी–कभी ज़रा-ज़रा

तमाम काम छोड़कर तेरी गली को चल दिए
वहीं मिली हमें ख़ुशी कभी-कभी ज़रा-ज़रा

तेरे ख़याल क्या कहूँ हैं जुगनुओं के झुंड से
सियाह रात रौशनी कभी-कभी ज़रा-ज़रा

है आग के सफ़र में जो लबों पे मेरे तिश्नगी
बुझी तो है मगर बुझी कभी–कभी ज़रा-ज़रा

किसी फ़क़ीर की तरह ग़मों पे हँस दिए "ख़याल"
ग़मों से की है दिल-लगी कभी-कभी ज़रा-ज़रा

 

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