ग़ज़ल
क्यों ख़िज़ाँ की शोख़ी इस दर्जा है हमको भा गयी
कोंपलें फूटीं तो इस दिल में उदासी छा गयी
चाँद रोटी सा नज़र आता है फ़ाक़ों में उन्हें
जिन गरीबों को ये रोटी टुकड़ा –टुकड़ा खा गयी
रेशमी चुनरी , ज़री का सूट फबता था उसे
बैठे-बैठे याद मुझको एक लड़की आ गयी
गर्द में गुम शह्र का ये हाल है देखो “ख़याल”
अब जमीं उड़कर दरख़्तों के बदन पर आ गई
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