ग़ज़ल
की हम हर रस्म बाखूबी निभाते हैं
उदासी ओड़कर भी मुस्कुराते हैं
अकेले तो शजर भी सूख जाते हैं
वो आने चार आने याद आते हैं
जो हो जाते हैं ओझल आंख से उनके
कि अक्सर नाम तक भी भूल जाते हैं
अब उसपे इश्क का गोता लगाते हैं
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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