Thursday, 5 January 2023

ग़ज़ल -34- गले मिलते हैं सबसे मुस्कुराते हैं-उड़ान *

 
ग़ज़ल
 
गले मिलते हैं सबसे मुस्कुराते हैं
की हम हर रस्म बाखूबी निभाते हैं
 
सिखा दी वक्त ने हमको अदाकारी
उदासी ओड़कर भी मुस्कुराते हैं
 
अकेला हो न कोई इस जमाने में
अकेले तो शजर भी सूख जाते हैं
 
भरे रहते थे जो अम्मा की थैली में
वो आने चार आने याद आते हैं

जो हो जाते हैं ओझल आंख से उनके
कि अक्सर नाम तक भी भूल जाते हैं
 
चुनर ख़्वाबों से रंग ली है वो बैठे हैं
अब उसपे इश्क का गोता लगाते हैं
 
 

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