Thursday, 5 January 2023

ग़ज़ल-37- बंद कमरों में चरागों को बुझा कर रोईये-उड़ान *

 

ग़ज़ल

 

बंद कमरों में चरागों  को बुझा कर रोईये

रोइए  तन्हा अंधेरों में कभी ग़र रोईये

 

हो गया अहसास से खाली जहां हर आदमी

अब वीरानों में दरख्तों ले लिपट कर रोईये


वक़्त की आंधी उड़ा कर ले गी सब हसरतें

ये निशाँ बाकी है ,अब ये खत जलाकर रोईये


कल थे इन आंखों में कुछ सपने किसी  आकाश के

देखकर अब इन परिंदों के कटे पर रोईये

 

दूर तक कोई ख़याल अपना नज़र आता नहीं

मानकर इस वक़्त को अपना मुकद्दर रोइए

 

 

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