Thursday, 5 January 2023

ग़ज़ल-48-हर घड़ी यूँ ही सोचता क्या है? -उड़ान *

हर घड़ी यूँ ही सोचता क्या है?
क्या कमी है ,तुझे हुआ क्या है?
किसने जाना है, जो तू जानेगा
क्या ये दुनिया है और ख़ुदा क्या है?
दर-बदर खाक़ छानते हो तुम
इतना भटके हो पर मिला क्या है?
एक अर्जी खुशी की दी थी उसे
उस गुज़ारिश का फिर हुआ क्या है?
मुस्कुरा कर विदाई दे मुझको
वक़्ते-आखिर है , सोचता क्या है?
दर्द पर तबसिरा किया उसने

हमने पूछा था बस दवा क्या है? 

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