Saturday, 7 January 2023

ग़ज़ल-49- आँगन में ही फूल खिला था- उड़ान *

आँगन में ही फूल खिला था
और मैं , रब्ब को ढूँढ रहा था
बिछिया थी तेरे पैरों में
मेरी उंगली में छल्ला था
दिल की बात हो या फिर घर की
दोनों में कुछ टूट चुका था
सहर हुई थी, सच है, लेकिन
तब तक सपना डूब चुका था
इसका उसका तेरा मेरा
मनका –मनका मन बिखरा था
यादों के बक्से से कल इक
रेशम का रुमाल मिला था
क़ीमत सोने से ज़्यादा थी
बचपन , पीतल का छल्ला था
याद "ख़याल" आई वो लड़की
आंसू बनकर दिल छलका था

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