रंज़ दिल से निकाल देता हूँ
ग़म को प्यालों में डाल देता हूँ
ग़म को प्यालों में डाल देता हूँ
ख़ुद से कहता हूँ मौत बख़्शिश है
ज़ेहन से डर निकाल देता हूँ
बात जब भी छिड़ी मुहब्बत की
बात को हँसके टाल देता हूँ
ये घटा, फूल, चाँद और धनक
सबको तेरी मिसाल देता हूँ
घर है, दफ़्तर है ,दुनियादारी है
ख़ुद को सांचों में ढाल देता हूँ
क़ैद अच्छी लगी रिहाई से
ख़ुद शिकारी को जाल देता हूँ
कौन अपना है और पराया कौन
एक सिक्का उछाल देता हूँ
नोक -पलकें संवार कर ग़म की
ग़म को शे’रों में ढाल देता हूँ
जब भी आसानियाँ बढ़ी हैं “ख़याल”
ख़ुद को मुश्किल में डाल देता हूँ
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