अपने होठों पे प्यास रखता हूँ
ख़ुद को यूं ही उदास रखता हूँ
दिल में क्या है वो पूछता है मुझे
फिर मैं खाली गिलास रखता हूँ
मुझको दरवेश अच्छे लगते हैं
सूफियों सा लिबास रखता हूँ
कंठ बशक जले हलाहल से
मैं लबों पे मिठास रखता हूँ
हो तबीयत उदास कितनी ही
मैं लबों पे मिठास रखता हूँ
दुःख कभी छोड़ कर नहीं जाते
इनको मैं आस –पास रखता हूँ
कोई देखे न तीरगी मन की
मुख पे झूठी उजास रखता हूँ
ज़िंदगी और शाइरी को “ख़याल”
मैं बहुत पास–पास रखता हूँ
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