Saturday, 4 February 2023

ग़ज़ल -54- हर तमन्ना लहू हमारी है- उड़ान *

हाय ! क़िस्मत अदू हमारी है
हर तमन्ना लहू हमारी है
यानि कुछ काम आ पड़ा हमसे
बे-सबब आबरू हमारी है
फिर न आना हो ऐसी दुनिया में
अब यही जुस्तजू हमारी है
मौत के बाद हमने पाया है
हम हैं और आरज़ू हमारी है
क्या मिला है सरा-ए-फ़ानी से
ख़ुद ही से गुफ़्तुगू हमारी है
आईने में भी हम ही हैं शायद
शक्ल तो हू-ब-हू हमारी है
लौ से कहते रहे पतंगे “ख़याल”
रौशनी चार-सू हमारी है

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