ख़ुशी में हो या हो ग़म में गुज़र तो होती है
ये उम्र कैसे न कैसे बसर तो होती है
मैं सह रहा हूँ यही सोच कर के ग़म सारे
हो रात कितनी भी लम्बी सहर तो होती है
कसक सी है ये मुहब्बत की एक-तरफ़ा सी
उधर की किसको ख़बर है , इधर तो होती है
हो राबता न अगर क्या, कि सिलसिला था कभी
मिलें भले न कभी हम , ख़बर तो होती है
बड़े यकीं से यहां लोग झूठ बोले “ख़याल”
बयान करती है सच को नज़र तो होती है
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