Friday, 7 April 2023

ग़ज़ल-70-शेरों में सब आंसू मेरे ढल जाते हैं-उड़ान*

शेरों  में सब आंसू मेरे ढल जाते हैं
पानी से ही कितने दीपक जल जाते हैं
 
किसने जंगली पौधों की सींचा है जाकर
फुटपाथों पर भूखे बच्चे पल जाते हैं
 
झूले ,पंछी ,बच्चे हों ग़र शाख़ों पर तो
सूखे भी हो पेड़ तो वो भी फल जाते हैं
 
शर्त यही है हक़ से कमाए हों ये तुमने
फिर सिक्के खोटे भी हों तो चल जाते हैं
 
तपती धूप हमेशा थोड़े रहती है जी
शाम आने पर, तय है,  सूरज ढल जाते हैं
 
सरल, सहज, सीधे लोगों की सोहबत करना
शातिर ,टेढ़े लोग तो अकसर छल जाते हैं
 
दे देते हैं जान “ख़याल” मुहब्बत में लोग
अंगारों पर फूलों से दिल जल जाते हैं
 


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