Thursday, 20 April 2023

ग़ज़ल -73- एक विरहन की मन –अगन जैसी-उड़ान *

 

एक विरहन की मन –अगन जैसी

रात वीरान सी है  वन जैसी  

मैं हमेशा उदास रहता हूँ

साथ रहती है इक घुटन जैसी 

 

किसको परवाह ज़िंदगी तेरी

तू है टूटे हुए बटन जैसी

 

ज़िंदगी क्या कहूँ कि कैसी है

तेरे लहज़े की इस चुभन जैसी

    

तेरे भेजे  गुलाब की ख़ुशबू

तेरे  महके हुए बदन जैसी

 

जीते रहने की इक ललक सी है

तेरे रंगीन पैरहन जैसी

 

हू-ब-हू शाम मुझको लगती है

मेरे उलझे उदास मन जैसी

 

मन तो सच्चा है जानकी की तरह

और ख्वाहिश किसी हिरन जैसी

 

दिल में रह –रह के उठ रही है ख़याल

चूर इक ख़्वाब की चुभन जैसी

 

 


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