Friday, 21 April 2023

ग़ज़ल -74-जब इरादा करके हम निकले हैं मंज़िल की तरफ़-उड़ान*

 

जब इरादा करके हम निकले हैं मंज़िल की तरफ़
ख़ुद ही तूफ़ाँ ले गया कश्ती को साहिल की तरफ़

बिजलियाँ चमकीं तो हमको रास्ता दिखने लगा
हम अँधेरे में बढ़े ऐसे भी मंज़िल की तरफ़्

क्या जुनूँ पाला है लहरों ने अजब पूछो इन्हें
क्यों चली हैं शौक़ से मिटने ये साहिल की तरफ़

गर ज़बां होती लहू की बोलता हक़ में मेरे

हो गये सब बोलने वाले तो क़ातिल की तरफ़  


है अँधेरी कोठरी मे एक छोटा सा चराग़

आँख अपनी बंद करके देख इस दिल की तरफ़

 

 मैं सिवा उसके किसी को देख न पाया “ख़याल”

                  था मेरा तो ध्यान उस गोटे की झिलमिल की तरफ़

 

 

 

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