ख़राब हाल थे सरकार कुछ किया कि नहीं ?
जो हाशिये पे थे उनका भी कुछ हुआ कि नहीं ?
मुझे तो भोर के नग्में सुनाई देते हैं
पता करो कि उजाला अभी हुआ कि नहीं ?
सुना है हमने बहार आने वाली है जल्दी
रुका हुआ था जो डोला अभी उठा कि नहीं?
वो बुन रहा था कोई आफ़ताब बरसों से
किवाड़ खोल के देखो कि दिन चढ़ा कि नहीं ?
उसे कहो कि ये सब तख़्त ताज दो दिन
हैं
कि उसने क़िस्सा सिकन्दर का वो सूना कि नहीं ?
अभी धुएँ को ही क्या आसमां वो कहता है ?
अना का आंख पे पर्दा था जो हटा कि नहीं ?
सुनाओ हाल मुझे मेरे गाँव का यारो
वो पुल जो टूट चूका था अभी बना कि नहीं?
यही तो पूछते ही दम निकल गया माँ का
अभी बिदेस से
बेटा मेरा चला कि नहीं ?
“ख़याल”
नाम तेरा याद है उसे अब तक ?
जो उसने लिक्खा था बाजू पे वो मिटा कि नहीं ?
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