Thursday, 11 May 2023

ग़ज़ल -76-अपने घर के दीवारो – दर देखे हैं- उडान*

 

अपने घर के दीवारो – दर देखे हैं
जाते –जाते सारे मंज़र देखे हैं
 
राजा ,रंक ,फ़कीर, सिकन्दर, दीवाने
 ताबूतों में टूटे  पिंजर देखे है   
 
बात चली हैं मेरी आँख के सपनों की  
रेत में डूबे कितने पत्थर देखे हैं  
 
क्या जाने कब लौटूं मैं परदेस से अब
  मुड़-मुड़ कर सब गाँव के घर देखे हैं
 
कल तक फूलों की क्यारी था दिल पर अब    
सूख रहे तालाब में कंकर देखे हैं
 
     चलते फिरते लोगों के झुकते सर पर,
दुःख के भारी भरकम गट्ठर देखे हैं
 
आंसू ,आहें, शाम ,उदासी और “ख़याल”
शाइर हूँ ,ग़ज़लों के ज़ेवर  देखे हैं 
 
 

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