ग़ज़ल
चलूँ ताज़ा ख़यालों से मैं इस महफ़िल को महकाऊं
है मौसम
कोंपलों का, क्यों कहानी ज़र्द दोहराऊँ
कसे फिर
साज़ के ए दिल जो मैने तार हिम्मत से
मुझे
तुम रोक लेना ग़र पुराना गीत मैं गाऊँ
मुझे तू
अपनी सोहबत में ही रहने दे मेरे मौला
कि मैं फिर से किसी गुल की मुहब्बत मे न मर जाऊँ
मुहब्बत से ही मुमकिन है कि रौशन हों हमारे दिल
मै लेकर
लौ मुहब्बत की अब आंगन तक तो आ
जाऊँ
मुहब्बत के चराग़ों से चलो हम रौशनी बाँटें
उधर से तुम चले आओ , इधर से मैं चला आऊं
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