इधर बस्तियां जल रही
हैं दुखों में
उधर जंगलों में खिली
चांदनी है
कमी क्या है पूछो
अंधेरों से जाकर
वही हैं सितारे वही
चादनी है
ख़याल इसको समझो यही
तो है जीवन
कभी है अमावस ,कभी
चांदनी है
ख्यालों में तेरे
बहे जा रहे हैं
पानी में जैसे घुली
चांदनी है
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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