Monday, 16 October 2023

इधर बस्तियां जल रही हैं दुखों में-उड़ान*

 

इधर बस्तियां जल रही हैं दुखों में
उधर जंगलों में खिली चांदनी है

कमी क्या है पूछो अंधेरों  से जाकर
वही हैं सितारे वही चादनी है
 
ख़याल इसको समझो यही तो है जीवन
कभी है अमावस ,कभी चांदनी है
 
ख्यालों में तेरे बहे  जा रहे हैं
पानी में जैसे घुली चांदनी है
 
 


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