ग़ज़ल
पुश्तैनी घर बेच आये
हैं
आज बहुत हम पछताए
हैं
पीतल जैस्सी धुप
खिली है
याद सुनहले पाल आये
हैं
किस्मत के खाली झोले
में
उम्मीदें भर कर लाये
हैं
रिश्तों पे इलज़ाम
नहीं है
ख़ुद ये धागे उलझाए
हैं
अपनी रूह का
कोई हिस्सा
तेरी गली में छोड़
आये हैं
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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