ग़ज़ल सतपाल ख़याल
मेरी
आंखों में ख़्वाब है फिर से
ख़त में
लिपटा गुलाब है फिर से
फिर उदासी
है बेसबब सी कोई
शाम है और
शराब है फिर से
तुमने फाड़ी
हैं अर्ज़ियाँ मेरी
यानि
मुझको को जवाब है फिर से
तेरे लिक्खे हुए थे ख़त जिसमें
हाथ में
वो किताब है फिर से
करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर ख़ाली लौट के आई आँख मंज़र , पस-मंज़...
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