जितने झूले थे वो सब पक्के घरों के पास थे
बाढ़ के, बरसात के डर छप्परों के पास थे
बिल्लियों
से रोटियाँ तरकीब से छीनी गईं
छल- कपट के सब तराज़ू बन्दरों के पास थे
लोग इक दूजे को पत्थर मारकर ख़ुश हो गये
साज़िशों के राज़ लेकिन पत्थरों के पास थे
हाथ में तामीर की ईंटें रही हैं उम्र भर
आंख में सपने घरों के, बेघरों के पास थे
लोग सब कुछ जानते थे फिर भी पीछे चल पड़े
कुछ नहीं था बस दिलासे रहबरों के पास थे
अर्जियां थी छुट्टियों के नौकरों के पास बस
गाड़ियां बंगले बगीचे अफ़सरों के पास थे
कैंचियों के डर परिंदों के मनों में थे
“ख़याल”
हौसलों के पंख भी लेकिन परों के पास थे
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