Monday, 20 November 2023

देहरी पर इक दीप जला कर बैठी है-उड़ान *

 

देहरी पर इक दीप जला कर बैठी है
कोई विरहन ख़्वाब सजा कर बैठी है

सूरज की तस्वीर बना कर बैठी है
रात हमें कैसे उलझा कर बठी है
 
किस्मत उड़ने देती है कब सपनों को
पाँव की जंजीर बना कर बैठी है
 
तुलसी के विरबे को जल देकर अम्माँ 
पास में उसके दीप जलाकर बैठी है 

 
 रोते रोते हंसने लग जाती है देख


 कैसे दुःख का बोझ उठा कर बैठी है

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