Friday, 20 September 2024

बन के आँसू बिखर गया पानी-दस्तक

 
बन के आँसू बिखर गया पानी
चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी

पानियों को भी काट दे ये कटार
इस सियासत से डर गया पानी
 
देख , सहमी हुई सी मछली को
कैसे पांनी से डर गया पानी

जल रहे घर की बात आई तो
फिर मदद को  मुकर गया पानी

दूब की नोक पे हो  शबनम ज्यूं
त्यूँ  पलक पर ठहर गया पानी

आँख तेरी ज़रा सी नम जो हुई
मेरी आँखों में भर गया पानी

जब से बिछड़ा "ख़याल" बादल से  
देख फिर दर-ब-दर गया पानी
 
 
 

Thursday, 19 September 2024

मुझको यूं ही उदास रहने दे- दस्तक

 

मुझको यूं ही  उदास रहने दे

फ़ेंक दे जाम प्यास रहने दे

 

दुख मुझे रब से जोड़ देते हैं

दुख मेरे आस पास रहने दे

 

आज बोतल को मुंह लगायेंगे

आज साक़ी गिलास रहने दे

 

तू मुक़द्दर समझ अंधेरों को

रौशनी के क़ियास रहने दे

 

मत बता इनको ज़िंदगी क्या है

अपने  बच्चे पुर-आस रहने दे

 

ख़ुश रहेंगे तो फिर कहेंगे क्या

शायरों को उदास रहने दे

 

मैं तेरी दोस्ती से वाक़िफ़ हूँ

छोड़ ए ग़म-शनास , रहने दे

 

जिस्म अब राख हो चुका है ख़याल”

जल चुका है लिबास रहने दे

 


बदल कर रुख़ हवा उस छोर से आये तो अच्छा है

 

बदल कर रुख़   हवा  उस छोर से आये  तो अच्छा है

मेरी कश्ती भी साहिल तक  पहुँच जाये  तो अच्छा है

 

मसाइल  और भी  मौजूद हैं  इस के सिवा  लेकिन

मोहब्बत  का भी  थोड़ा ज़िक्र  हो जाये तो  अच्छा है

 

दिलों में  उल्फ़तें हों , ज़ेहन  में  चालाकियां कम  हों

कोई  चंद  ऐसे  लोगों  से  जो  मिलवाये  तो अच्छा है

 

गली  तेरी , मकां  तेरा , पता  तेरा , पता  किस को

कि तेरे शह्र का ही कोई मिल जाये  तो अच्छा है

.

अदालत भी  उसी की  है , वकालत भी “ख़याल” उस की

वो  पेचीदा दलीलों  में न  उलझाये  तो अच्छा है

 

Monday, 16 September 2024

फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा-दस्तक

 
फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा
पानी पर तस्वीर बना कर देखूँगा
 
गुज़रे वक़्त को आज पुकारूँगा फिर से
मैं तुम को आवाज़ लगा कर देखूँगा
 
ढालूंगा मैं आंसू अपने शे’रों में
पानी से मैं दीप जला कर देखूँगा
 
लोग सलीब उठा कर कैसे चलते हैं
मैं इक शख़्स  का बोझ उठा कर देखूँगा
 
कोई एक सवेर तो अच्छी आएगी
मैं उम्मीद की जोत जला कर देखूँगा
 
हो सकता है कोई किनारा मिल जाए
दूर उफ़क़ के पार मैं जा कर देखूँगा
 
सच पर कैसे मर मिटते हैं लोग “ख़याल”
मैं सूली पर शीश  टिका कर देखूँगा

इम्काँ तो अच्छे देखे हैं-दस्तक

 
इम्काँ तो  अच्छे देखे हैं
ग़ुंचे, गुल बनते देखे हैं
 
किस ने मधुवन महका देखा 
किस ने दिन अच्छे देखे हैं
 
भूख , ग़रीबी और लाचारी
मेहनत के तमग़े देखे हैं

पलकों से अंगार उठाकर
फूलों के सपने देखे हैं
  
आवारा से बादल थे कुछ
सहरा से लड़ते देखे हैं
     
वक़्त की  शाख़ों पर कुछ लम्हें
कलियों से चटके देखे हैं
कलियों से चटके देखे हैं
  
झूठे , कपटी और फ़रेबी
सब तेरे जैसे देखे हैं
 
पीर “ख़याल” न देखी मन की
सब ने लब हंसते देखे हैं
  •  

Thursday, 5 September 2024

तुझ पे क़लम-कार ऐतबार नहीं है- दस्तक

 
तुझ पे क़लम-कार ऐतबार नहीं है
झूटे हैं अख़बार ए'तिबार नहीं है
 
डूब गए हम भँवर में तुझ को बचाते
हम पे भी सरकार ऐतबार नहीं है
 
लब  पे सजा के रखी है सब ने बनावट
सब हैं अदाकार ऐतबार नहीं है
 
कौन यहां बेच दे ज़मीर किसी को
ये तो है बाज़ार ऐतबार नहीं है
 
तेरा ख़ुदा हूँ यक़ीन कर के कभी देख
फेंक दे पतवार ऐतबार नहीं है
 
कौन सुनेगा यहां "ख़याल" तेरी बात
सज गए इजलास ऐतबार नहीं है

दुखी मन है ग़ज़ल कोई कही जाए-दस्तक

 
दुखी मन है ग़ज़ल कोई कही जाए
किसी अपने से दिल की बात की जाए
 
ये नाज़ुक तार साँसों के तो टूटेंगे
सदा-ए-साज़ जब तक है सुनी जाए
 
खड़ी है बाल खोले दर पे तन्हाई
ये विरहन या ख़ुदा दर से चली जाए
 
खरी-खोटी, भली-चंगी जो दिल में है
कहीं दिल में न रह जाए कही जाए
 
“ख़याल” आते हैं दश्त-ए-दिल में यूँ तेरे
किसी वीराने से जैसे नदी जाए

झूठ को ठीक से बोलना सीखिए-दस्तक

 
झूठ को ठीक से बोलना सीखिए
ये हुनर सीखिए , ये अदा सीखिए
 
फ़ायदा जिस तरफ़  उस तरफ़ चल पड़ो
ये नया दौर है ,  कुछ  नया सीखिए
 
ज़िंदगी वश में आई नहीं इल्म  से
अब कोई टोना या टोटका  सीखिए
 
फल रहा झूठ ,  झूठे तरक़्क़ी पे हैं
छल-कपट का नया  क़ायदा सीखिए
 
ज़िंदगी जो भी दे बस क़बूलो उसे
इस की लय-ताल पर नाचना सीखिए
 
छोड़िए  फ़िक्र इक-दूसरे की “ख़याल”
सीखिए अपने हित साधना सीखिए

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...