Monday, 6 January 2025

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख
सच को देख न पाई आँख
 
आवारा तितली जैसी
चेहरों पर मंडराई आँख
 
दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी फिर
ख़ाली लौट के आई आँख
 
मंज़र पस-मंज़र देखे
शाइर की दानाई आँख
 
देख सियासत-दानों की
हँसती है बलवाई आँख
 
याद आया कुछ बैठे-बैठे
भर आई सौदाई आँख
 
तकते–तकते राह “ख़याल”
दर पर भी उग आई आँख
 
 
 


Wednesday, 9 October 2024

dastak- क्या है उस पार कोई शख़्स ये समझा न सका

 क्या है उस पार कोई  शख़्स ये समझा न सका
क्या जगह है जो गया लौट के फिर   सका
 
मैं तो आदी था विरासत में मिले ग़म मुझ को
जो
जो मेरे साथ रहा वो  भी  ख़ुशी पा न सका
 
टूटे पत्तों  को शजर बन के निहारा मैं ने
जो गए छोड़ मुझे उन को कभी ला न सका
 
किस से मिलना है गले हाथ मिलाना किस से
फ़ासला किस से रखूँ कितना समझ   सका

बस ये भीगी सी है जो रेत यही साथी है
एक सूखा सा मैं दरिया हूँ जो लहरा न सका

इक सिरा सुलझे तो उलझा है कोई दूजा सिरा
ज़िंदगी ऐसे कुछ उलझी कि मैं सुलझा न सका
 
दरमियाँ थी ये मुक़द्दर की ही दीवार ख़याल
वो इधर आ न सका , मैं भी उधर जा न सका


Friday, 20 September 2024

बन के आँसू बिखर गया पानी-दस्तक

 
बन के आँसू बिखर गया पानी
चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी

पानियों को भी काट दे ये कटार
इस सियासत से डर गया पानी
 
देख , सहमी हुई सी मछली को
कैसे पांनी से डर गया पानी

जल रहे घर की बात आई तो
फिर मदद को  मुकर गया पानी

दूब की नोक पे हो  शबनम ज्यूं
त्यूँ  पलक पर ठहर गया पानी

आँख तेरी ज़रा सी नम जो हुई
मेरी आँखों में भर गया पानी

जब से बिछड़ा "ख़याल" बादल से  
देख फिर दर-ब-दर गया पानी
 
 
 

Thursday, 19 September 2024

मुझको यूं ही उदास रहने दे- दस्तक

 

मुझको यूं ही  उदास रहने दे

फ़ेंक दे जाम प्यास रहने दे

 

दुख मुझे रब से जोड़ देते हैं

दुख मेरे आस पास रहने दे

 

आज बोतल को मुंह लगायेंगे

आज साक़ी गिलास रहने दे

 

तू मुक़द्दर समझ अंधेरों को

रौशनी के क़ियास रहने दे

 

मत बता इनको ज़िंदगी क्या है

अपने  बच्चे पुर-आस रहने दे

 

ख़ुश रहेंगे तो फिर कहेंगे क्या

शायरों को उदास रहने दे

 

मैं तेरी दोस्ती से वाक़िफ़ हूँ

छोड़ ए ग़म-शनास , रहने दे

 

जिस्म अब राख हो चुका है ख़याल”

जल चुका है लिबास रहने दे

 


बदल कर रुख़ हवा उस छोर से आये तो अच्छा है

 

बदल कर रुख़   हवा  उस छोर से आये  तो अच्छा है

मेरी कश्ती भी साहिल तक  पहुँच जाये  तो अच्छा है

 

मसाइल  और भी  मौजूद हैं  इस के सिवा  लेकिन

मोहब्बत  का भी  थोड़ा ज़िक्र  हो जाये तो  अच्छा है

 

दिलों में  उल्फ़तें हों , ज़ेहन  में  चालाकियां कम  हों

कोई  चंद  ऐसे  लोगों  से  जो  मिलवाये  तो अच्छा है

 

गली  तेरी , मकां  तेरा , पता  तेरा , पता  किस को

कि तेरे शह्र का ही कोई मिल जाये  तो अच्छा है

.

अदालत भी  उसी की  है , वकालत भी “ख़याल” उस की

वो  पेचीदा दलीलों  में न  उलझाये  तो अच्छा है

 

Monday, 16 September 2024

फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा-दस्तक

 
फिर से प्रेम की अलख जगा कर देखूँगा
पानी पर तस्वीर बना कर देखूँगा
 
गुज़रे वक़्त को आज पुकारूँगा फिर से
मैं तुम को आवाज़ लगा कर देखूँगा
 
ढालूंगा मैं आंसू अपने शे’रों में
पानी से मैं दीप जला कर देखूँगा
 
लोग सलीब उठा कर कैसे चलते हैं
मैं इक शख़्स  का बोझ उठा कर देखूँगा
 
कोई एक सवेर तो अच्छी आएगी
मैं उम्मीद की जोत जला कर देखूँगा
 
हो सकता है कोई किनारा मिल जाए
दूर उफ़क़ के पार मैं जा कर देखूँगा
 
सच पर कैसे मर मिटते हैं लोग “ख़याल”
मैं सूली पर शीश  टिका कर देखूँगा

इम्काँ तो अच्छे देखे हैं-दस्तक

 
इम्काँ तो  अच्छे देखे हैं
ग़ुंचे, गुल बनते देखे हैं
 
किस ने मधुवन महका देखा 
किस ने दिन अच्छे देखे हैं
 
भूख , ग़रीबी और लाचारी
मेहनत के तमग़े देखे हैं

पलकों से अंगार उठाकर
फूलों के सपने देखे हैं
  
आवारा से बादल थे कुछ
सहरा से लड़ते देखे हैं
     
वक़्त की  शाख़ों पर कुछ लम्हें
कलियों से चटके देखे हैं
कलियों से चटके देखे हैं
  
झूठे , कपटी और फ़रेबी
सब तेरे जैसे देखे हैं
 
पीर “ख़याल” न देखी मन की
सब ने लब हंसते देखे हैं
  •  

Thursday, 5 September 2024

तुझ पे क़लम-कार ऐतबार नहीं है- दस्तक

 
तुझ पे क़लम-कार ऐतबार नहीं है
झूटे हैं अख़बार ए'तिबार नहीं है
 
डूब गए हम भँवर में तुझ को बचाते
हम पे भी सरकार ऐतबार नहीं है
 
लब  पे सजा के रखी है सब ने बनावट
सब हैं अदाकार ऐतबार नहीं है
 
कौन यहां बेच दे ज़मीर किसी को
ये तो है बाज़ार ऐतबार नहीं है
 
तेरा ख़ुदा हूँ यक़ीन कर के कभी देख
फेंक दे पतवार ऐतबार नहीं है
 
कौन सुनेगा यहां "ख़याल" तेरी बात
सज गए इजलास ऐतबार नहीं है

दुखी मन है ग़ज़ल कोई कही जाए-दस्तक

 
दुखी मन है ग़ज़ल कोई कही जाए
किसी अपने से दिल की बात की जाए
 
ये नाज़ुक तार साँसों के तो टूटेंगे
सदा-ए-साज़ जब तक है सुनी जाए
 
खड़ी है बाल खोले दर पे तन्हाई
ये विरहन या ख़ुदा दर से चली जाए
 
खरी-खोटी, भली-चंगी जो दिल में है
कहीं दिल में न रह जाए कही जाए
 
“ख़याल” आते हैं दश्त-ए-दिल में यूँ तेरे
किसी वीराने से जैसे नदी जाए

झूठ को ठीक से बोलना सीखिए-दस्तक

 
झूठ को ठीक से बोलना सीखिए
ये हुनर सीखिए , ये अदा सीखिए
 
फ़ायदा जिस तरफ़  उस तरफ़ चल पड़ो
ये नया दौर है ,  कुछ  नया सीखिए
 
ज़िंदगी वश में आई नहीं इल्म  से
अब कोई टोना या टोटका  सीखिए
 
फल रहा झूठ ,  झूठे तरक़्क़ी पे हैं
छल-कपट का नया  क़ायदा सीखिए
 
ज़िंदगी जो भी दे बस क़बूलो उसे
इस की लय-ताल पर नाचना सीखिए
 
छोड़िए  फ़िक्र इक-दूसरे की “ख़याल”
सीखिए अपने हित साधना सीखिए

Saturday, 15 June 2024

इबादत बाद में पहले मगर रोटी ज़रूरी है *

इबादत  बाद  में  पहले  मगर  रोटी  ज़रूरी है
न  हो  पूरी  तो  आधे  चाँद  सी  आधी  ज़रूरी है 

उजालों  पर  तेरी  तक़रीर  से कुछ  भी  नहीं  होगा 
दिए  में  तेल  से  भीगी  हुई  बाती  ज़रूरी  है 

शराफ़त  का  बहुत  नुकसां  उठाया  है  यहाँ  मैं ने 
मैं  बच्चों  को  ये  समझाता  हूँ  चालाकी  ज़रूरी है 

मसीहा  की   मसीहाई   का  चर्चा  किस  तरह  होगा 
ज़रूरी   है  यहाँ   बीमार ,   बीमारी  ज़रूरी  है 

ज़रूरत  से  हैं  सब  रिश्ते ,  न  हो  तो  कौन  पूछेगा 
अगर  बारिश  न  हो  सोचो  तो  क्या  छतरी  ज़रूरी है ?

ज़रा  सा  रोज़  मरने  का  भी  मैं  अभ्यास  करता  हूँ 
कि  मरना  तय  है  तो  मरने  की  तैयारी  ज़रूरी है 

वो   सूरज  तो  नहीं  उग  आए  अपने  आप  जो  हर रोज़ 
वो  हाकिम  है  उजालों  के  लिए  अर्ज़ी  ज़रूरी है 

"ख़याल" अब  मेहरबां  है  वो ज़ुबाँ मीठी  कई  दिन से 
बुलंदी  पर  पहुंचना  है  अभी  सीढ़ी  ज़रूरी  है 

Thursday, 30 May 2024

चलो ताज़ा ख़यालों से तेरी महफ़िल को महकाऊं-दस्तक़

 
चलूँ ताज़ा ख़यालों से तेरी महफ़िल को महकाऊं
है मौसम कोंपलों का क्यों कहानी ज़र्द दोहराऊँ
 
कसे फिर साज़ के ए दिल, जो मैनें तार हिम्मत से
मुझे तुम रोक लेना गर पुराना गीत मैं गाऊँ
 
मुझे सोहबत में अपनी रख मेरे मौला, मेरे साईं
कि मैं  फिर से किसी गुल की मोहब्बत मे न मर जाऊँ
 
मोहब्बत से ही मुमकिन है कि रौशन हों हमारे दिल
मै लेकर लौ मोहब्बत की अब आंगन तक तो आ जाऊँ
 
मोहब्बत के चराग़ों से चलो हम रौशनी बाँटें
उधर से तुम चले आओ इधर से मैं चला आऊं
 

Saturday, 20 April 2024

उधर तुम हो , ख़ुशी है

 
उधर तुम हो , ख़ुशी है
इधर बस बेबसी है
 
ये कैसी रौशनी है
अँधेरा ढो रही है
 
नहीं इक पल सुकूं का
ये कोई ज़िंदगी है
 
मुसीबत है , बुला ले
ये बाहर क्यों खड़ी है?
 
किनारे पर है कश्ती
किनारा ढूंढ़ती है

Wednesday, 13 March 2024

ये रौनकें , ये महिफ़िलें , ये मेले इस जहान के-दस्तक


मुआमला  दिलों का ये  बड़ा ही पेचदार है 
कि जिसने ग़म दिए हमारा वो ही ग़म-गुसार है 

न मंज़िलों की है ख़बर न दूरियों का है पता 
भटक रहे हैं कब से हम ये कैसी रहगुज़ार है 


किसी ने भेजा आ गये ,बुला लिया चले गए 
कि मौत हो या ज़िंदगी , किसी का इख़्तियार है ?

ये रौनकें , ये महिफ़िलें , ये मेले इस जहान के
ए ज़िंदगी , ख़ुदा का भी तुझी से कारोबार है


उसी ने डाले मुश्किलों मे मेरे जान-ओ-दिल मगर
उसी पे जाँ निसार है , उसी पे दिल निसार है


तुमीं को हमने पा लिया , तुमीं को हमने खो दिया
तू ही हमारी जीत है, तू ही हमारी हार है

Tuesday, 12 March 2024

सलीबों को उठाना आ गया है*

सलीबों को उठाना आ गया है
मुझे जीवन बिताना आ गया है  

घड़े शहरों  में भी बिकने लगे हैं 
ज़माना फिर पुराना आ गया है 

चलो अच्छा नहीं आये हैं गिरधर 
हमें परबत उठाना आ गया है 

अलग कर  दो मुझे अब कारवाँ से 
रुको , मेरा ठिकाना आ गया है 

चढ़ा है रंग दुनिया का ब-ख़ूबी
तुम्हें भी  दिल दुखाना आ गया है  

शिकायत ही नहीं करता किसी से 
मुझे  रिश्ता निभाना आ गया है

ज़रा मुड़ कर सफ़र को याद कर लो
ए दरियाओ मुहाना आ गया  

पिता ख़ुश है कि बेटे को "ख़याल" अब 
दो टुक रोटी कमाना आ गया है 


इस जमीं में है , आसमान में हैं *


इस जमीं में है , आसमान में हैं
गर ख़ुदा है तो किस जहान में है

मुश्किलों में है तेरे बंदे, ख़ुदा
उनकी मुश्किल तुम्हारे ध्यान में है ?

बड़बड़ाता है मुझ में रह-रह कर
क्या कोई और इस मकान में है

क्यों सितारों की आंखें नम -नम हैं
चाँद तो अब भी आसमान में है

ईंट गारे की फ़िक्र क्या करना
घर तो आख़िर तेरा मसान में है

देख बिखरा है घर सम्भाल इसे
तुमको रहना इसी मकान  में है

Friday, 8 March 2024

तेरे बीमार रहने से ही ये बाज़ार चलता है*

तेरे बीमार रहने से ही ये बाज़ार चलता है
दवाऐं बेचने वालों का कारोबार चलता है

रखा जाता है हमको  भूख बीमारी के साए में 
कुछ ऐसे तौर से इस  देश में व्यापार चलता है


वही लिक्खा है अख़बारों  ने जो सरकार ने चाहा 
सियासत के इशारों पर ही तो  अख़बार  चलता है


सजाएं भी आवार्डों की तरह मरने पे मिलती हैं 
कुछ ऐसी चाल से इन्साफ का दरबार चलता है 


सियासत काठ की हांडी  जो बारंबार चढ़ जाए 
ये वो सिक्का है , जो खोटा है , जो हर-बार चलता है 


कमाता है कोई इतना के पड़पोते भी पल जाएं 
कमाते हैं कई ता-उम्र बस घर -बार चलता है 


लोग आते हैं , तडपते हैं ,चले जाते हैं फिर इक दिन 
न जाने किसके कहने पर तेरा संसार चलता है 


चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी*

 


चढ़ते-चढ़ते उतर गया पानी
बनके आंसू बिखर गया पानी  

पानियों को भी काट दे ये कटार
इस सियासत से डर गया पानी

एक सहमी हुई सी मछली है
कैसे पांनी से डर गया पानी

जल रहे घर की बात आई तो
फिर मदद से मुकर गया पानी

दूब की नोक पे हो शबनम ज्यूं
त्यूँ पलक पे ठहर गया पानी

आंख तेरी ज़रा सी नम जो हुई

मेरी आँखों में भर गया पानी

जब से बिछड़ा "ख़याल" सागर से
देख फिर दर -ब -दर गया पानी

Tuesday, 20 February 2024

मैं शायर हूँ ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी*

मैं शायर हूँ ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी
कि मैंने शौक़ से बोली कभी उर्दू कभी हिंदी

यहाँ हिन्दी भी दुःख में है तो उर्दू भी परेशां है 
हैं  बेबस एक ही जैसी कभी उर्दू कभी हिंदी

अदब को तो अदब रखते ज़बानों पर सियासत क्यों
सियासत ने मगर बाँटी कभी उर्दू कभी हिंदी

जो आसां हो ,सरल ,सीधी , ज़बां अपनी 
ये मेरी भी है तेरी भी,   कभी उर्दू कभी हिंदी

इसी मिट्टी की ख़ुशबू है ,इसी मिट्टी से बाबस्ता 
कभी ग़ालिब ,कभी तुलसी ,कभी उर्दू कभी हिन्दी 


Monday, 19 February 2024

New Ghazal- ख़यालों से बनाई क़ैद में था *


मैं अपनी ही बनायी क़ैद में था 
मैं अपनी सोच की ही क़ैद में था 

अंधेरों ने कभी घेरा है मुझको 
कभी  मैं रौशनी की क़ैद में था 

डरा पल तौलते ही वो अचानक 
मेरे जैसा था वो भी क़ैद में था 

रिहाई हो रही थी तब मैं समझा
मैं अपने जिस्म की ही क़ैद में था

"ख़याल" उड़ जाने की चाहत बहुत थी 
मगर पन्छी किसी की  क़ैद में था 

करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...