Monday, 20 November 2023

देहरी पर इक दीप जला कर बैठी है-उड़ान *

 

देहरी पर इक दीप जला कर बैठी है
कोई विरहन ख़्वाब सजा कर बैठी है

सूरज की तस्वीर बना कर बैठी है
रात हमें कैसे उलझा कर बठी है
 
किस्मत उड़ने देती है कब सपनों को
पाँव की जंजीर बना कर बैठी है
 
तुलसी के विरबे को जल देकर अम्माँ 
पास में उसके दीप जलाकर बैठी है 

 
 रोते रोते हंसने लग जाती है देख


 कैसे दुःख का बोझ उठा कर बैठी है

दुःख की गठरी धोते रहना उफ़ नही कहना है -दस्तक

 दुख की गठरी धोते रहना उफ़ नही कहना है 
जब तक सांस चलेगी तब तक ज़िंदा रहना है 

दुख रोटी है ,दुख चूल्हा है ,दुख ही पेट की भूख  
दुःख ओढ़ा है , दुख ही बिछाया , दुख ही पहना है 


चिंता साथ हुई है पैदा ,साथ ही जायेगी

विरहन का सिंगार है चिंता , 
चिंता  बिंदिया , चिंता काजल  चिंता  गहना है


पहना है 

इस तिनके को इस दरिया के साथ ही बहना है 

अंतिम रेखा दूर बहुत है , चलते रहना है 

पलकों पर इक आंसू आकर ठहरा है- उड़ान *

 

पलकों पर इक आंसू आकर ठहरा है

मेरे दुःख पर चौकीदार का पहरा है 


सागर पर इक बूँद का कैसा पहरा है 

पलकों पर इक आंसू आकर ठहरा है


ख़ुशियों पर इस चौकी दार का पहरा है

 

कितने दुःख बैठे इसकी गहराई में

दिल तो अपना सागर से भी गहरा है


कैसा सपना देख रहा है पागल मन

आगे पीछे बस सहरा ही सहरा है

  

रात भले कितनी भी लम्बी हो जाए 

मेरी आंख में सपना बहुत सुनहरा है

 

जंगल की फरियाद सुनेगा कौन “ख़याल”

जिसके हाथ में आरी है वो बहरा है

 

 

 

 

 

 

 

हमको तकदीर बचा ले कोई बात बने-उड़ान *

 
हमको तक़दीर बचा ले कोई बात बने
दर्द , दामन ही छुड़ा  ले  कोई  बात बने
 
क्या गुज़ारिश मैं करूँ उससे डुबोया जिसने
अब तो दरिया ही उछाले तो कोई बात बने

कश्तियाँ हैं ये तो कागज़ की लड़ेंगी कब तक
इन को तूफां ही बचा ले तो कोई बात बने
 
कोई सूरज मेरी खिड़की पे तो उगने से रहा
अब  कोई  घर से निकाले तो कोई बात बने
 
ख़ुदकुशी करने की हिम्मत भी  नहीं  है मुझमें
ज़िंदगी मुझको संभाले तो कोई बात बने

 ढक लिया वक्त की  काई ने मैं  ठहरा जब से
अब कोई आके खंगाले तो कोई बात बने

ग़म से हारे नहीं हम , हमसे नहीं जीता ग़म 
कोई सिक्का जो उछाले तो कोई बात बने
 
मैं ख्यालों में जिसे चूम रहा हूँ , मुझको
वो गले से जो लगाले तो कोई बात बने
 
 

किसी ने की है ख़ुदकुशी , मरा है आम आदमी -उड़ान *

 


 
किसी ने की है ख़ुदकुशी , मरा है आम आदमी 
कि जिंदगी से इस कदर खफ़ा है आम आदमी
 
ये मजहबी फसाद सब ,सियासती जूनून हैं
जुनू की आग में सड़ा जला है आम आदमी
 
ख़ुद अपना खून बेचकर खरीदता है रोटियां
गरीब है इसीलिए बिका है आम आदमी


ख़याल में है रोटियाँ तो ख़्वाब में भी रोटियां
बस इनके ही जुगाड़ में मरा है आम आदमी


खुशी मिली उधार की .लिया मकां कर्ज़ पर
यूं उम्र बहर के कर्ज़ में दबा है आम आदमी


सियासती फसाद हो ,बला हो कोई कुदरती
है बेगुनाह पर सदा , मरा है आम आदमी
 

हमसे मिलने कैसे भी करके बहाने आ गया-उड़ान *

 
ग़ज़ल
हमसे मिलने कैसे भी  करके बहाने आ गया
यार अपना हाले-दिल सुनने –सुनाने आ गया
 
कोंपलें फूंटी भार आने को थी कि फिर  से वो
ज़र्द मौसम लेके हमको आजमाने आ गया
 
मजहबी उन्माद भडका जब हमारे शह्र में
मेरा हमसाया ही मेरा घर जलाने आ गया
 
वक़्त ने कल फूंक डाला था चमन मेरा मगर
आज वो कुछ फूल गमलों में उगाने आ गया
 
बह गईं सैलाब में सब हस्ती गाती बस्तियां
अब वो गोवर्धन को उंगली पे उठाने आ गया

 
कुछ ही दिन बीते ख़याल अपने यहाँ पर चैन से
फेर फिर तकदीर का हमको डराने आ गया
 

Tuesday, 7 November 2023

पानी पर तस्वीर बना कर देखूंगा-उड़ान *

 

 

फिर मैं तेरे ख़्वाब सजा कर देखूंगा  

 पानी पर तस्वीर बना कर देखूंगा


गाँव , गली ,खिड़की से पूछूंगा जाकर  

मैं तुम को आवाज़ लगा कर देखूंगा

 

आंखों के पानी से लिखूंगा गजलें 

मैं पानी से दीप जला कर देखूंगा

 

लोग सलीब उठा कर कैसे चलते हैं

मैं इक शख्स का बोझ उठा कर देखूंगा

 

कोई एक सुबह तो अच्छी आएगी

मैं इक आस की जोत जला कर देखूंगा 

 

हो सकता है कोई किनारा मिल जाए

दूर क्षितज के पार मैं जा कर देखूंगा

 

 लुटा कर देखूंगा

सूना कर देखूंगा

जुटा कर देखूंगा

 

कमा कर देखूंगा

 

 

Saturday, 4 November 2023

तुझे ज़िंदगी यूँ बिताया है मैनें-उड़ान *

 
तुझे ज़िंदगी यूँ बिताया है मैनें
कि पलकों से अंगार उठाया है मैनें

किसी से मुहब्बत किसी से अदावत
कि हर एक रिश्ता निभाया है मैनें

तेरी बेवफ़ाई बकाया है मुझ पर
गो क़र्ज़ा वफ़ा का चुकाया है मैनें

अंधेरों से मुझको शिकायत नहीं है 
उजाला नज़र में छुपाया है मैनें

 
ज़माने के ग़म हैं मेरी शायरी में 
कि क़ूज़े में दरिया उठाया है मैंने

हरिक मोड़ पर बस बदी ही खड़ी थी
बचा जितना दामन बचाया है मैंने

मैं तुम पे ये तोहमत धरूँ क्यों ख़यालअब
कि ख़ुद अपना दामन जलाया है मैंने
 
 
 

Friday, 27 October 2023

नज़्म – जंग रोक दीजिए

 

नज़्म – जंग रोक दीजिए –सतपाल ख़याल

 

बिखर गये हैं कितने घर, ये जंग रोक दीजिए

लहू बहा इधर –उधर ,  ये जंग रोक दीजिए

 

जले हैं जिस्म आग में , धुआँ – धुआँ है बस्तियां

किसी के बच्चे मर गये  किसी की माँ नहीं रही

कहीं पिता के हाथ में  है लाश अपने बेटे की

कहीं पे माँ की लाडली  सी नन्ही जाँ नहीं रही

 

ये मज़हबों के नाम पर न आदमी को बांटिये

न टूटे और कोई घर,  ये जंग रोक दीजिए

 

अभी भी वक़्त है कहीं पे बैठ के ये सोचिए

कि जंग की है आग क्यों लगी हुई यहाँ –वहां

गिरा न दे ये सबके घर , जला न दे ये सबके घर ,

ये साजिशों को आग है , जली हुई यहाँ –वहां

 

कहीं कोई हो सुन रहा , यही मेरी है इल्तिजा

मैं कह रहा पुकार कर  , ये जंग रोक दीजिए

 

बिखर गये हैं कितने घर , ये जंग रोक दीजिए

लहू बहा इधर –उधर , ये जंग रोक दीजिए

 

 

 

 

 

Monday, 16 October 2023

इस दिल में एक दो बस अरमान रह गये हैं-उड़ान *

 
ग़ज़ल


इस दिल में एक दो बस अरमान रह गये हैं
दिल के मकां में अब ये महमान रह गए हैं
 
ख़ुद को हूँ जिसने चाहा आगे निकल गया वो
दुनिया की फ़िक्र करते नादान  रह गए हैं
 
आने को है क़यामत बेबस है क्या करे वो
दुनिया में इक्का-दुक्का इंसान रह गए हैं
 
कुछ सीख होशियारी ,कुछ सीख दुनियादारी
 
 
क्यों अब ख़याल उसका आता नहीं है मन में
गुल ले गये हैं ताज़िर,गुलदान रह गये हैं
 

कभी दो बूँद गले से उतार कर देखो- उड़ान *

 
कभी दो बूँद गले से उतार कर देखो
कभी खुमार में दो पल गुज़ार कर देखो
 
मैं उसके दिल में हूँ तो अश्क बनके टपकूंगा
कि मेरे नाम से उसको पुकार कर देखो
 
मजा नहीं है फ़कत जीतने में हर बाज़ी
मजा तो हार में भी है जो हार कर देखो
 
कहीं मिले तो कहो तुम हूर जन्नत की
यूं आईने में उसे तुम उतार करा देखो
 
“ख़याल” क्या है जुदाई , विसाल क्या शैय है
कि दिल में हिज़्र का खंजर उतार कर देखो

जितने झूले थे वो सब पक्के घरों के पास थे-उड़ान *

 
जितने झूले थे वो सब पक्के घरों के पास थे
बाढ़ के, बरसात के डर छप्परों के पास थे
 
 
बिल्लियों से रोटियाँ तरकीब से छीनी गईं
छल- कपट के सब तराज़ू बन्दरों के पास  थे
 
लोग इक दूजे को पत्थर मारकर ख़ुश हो गये
साज़िशों के राज़ लेकिन  पत्थरों के पास थे
 
हाथ में तामीर की ईंटें रही हैं उम्र भर
आंख में सपने घरों के, बेघरों के पास थे
 
लोग सब कुछ जानते थे फिर भी पीछे चल पड़े
कुछ नहीं था बस दिलासे रहबरों के पास थे
 
अर्जियां थी छुट्टियों के नौकरों के पास बस
गाड़ियां बंगले बगीचे अफ़सरों के पास थे
 
कैंचियों के डर परिंदों के मनों में थे “ख़याल” 
हौसलों के पंख भी लेकिन परों के पास थे
 
    

ज़िन्दगी जैसे बने , वैसे बिताकर चल पड़ो- उड़ान *

 
ज़िन्दगी जैसे बने , वैसे बिताकर चल पड़ो
बोझ है तो बोझ को सर पर उठाकर चल पड़ो
 
अश्क़ गुदड़ी में छुपाकर रख लो गौहर की तरह
फेक सी मुस्कान को लब पर सजाकर चल पड़ो
 
दर्द की आदत ही पड़ जाए तो फिर तुम यूं करो
पैर में काँटा कोई फिर से चुभाकर चल पड़ो
 
जिनको ढोते ढोते कितने लोग मिट्टी हो गए
तुम भी उन सारी सलीबों को उठाकर चल पड़ो
 
ख़ाक़ हो जायेंगे सारे चोर हों या साध हों
क्या भला है, क्या बुरा ,सब कुछ भुलाकर चल पड़ो
 
अपने होने की भी कोई तो निशानी दो 'ख़याल'
चंद अपने शेर यारों को सुनाकर चल पड़ो

पुश्तैनी घर बेच आये हैं-उड़ान *

 
ग़ज़ल
पुश्तैनी घर बेच आये हैं
आज बहुत हम पछताए हैं
 
पीतल जैस्सी धुप खिली है
याद सुनहले पाल आये हैं

किस्मत के खाली झोले में
उम्मीदें भर कर लाये हैं
 
रिश्तों पे इलज़ाम नहीं है
ख़ुद ये धागे उलझाए हैं
 
अपनी रूह का कोई  हिस्सा
तेरी गली में छोड़ आये हैं 
 
 
 

इधर बस्तियां जल रही हैं दुखों में-उड़ान*

 

इधर बस्तियां जल रही हैं दुखों में
उधर जंगलों में खिली चांदनी है

कमी क्या है पूछो अंधेरों  से जाकर
वही हैं सितारे वही चादनी है
 
ख़याल इसको समझो यही तो है जीवन
कभी है अमावस ,कभी चांदनी है
 
ख्यालों में तेरे बहे  जा रहे हैं
पानी में जैसे घुली चांदनी है
 
 


मेरी आंखों में ख़्वाब है फिर से-उड़ान *

 

ग़ज़ल सतपाल ख़याल
मेरी आंखों में ख़्वाब है फिर से
ख़त में लिपटा गुलाब है फिर से
 
फिर उदासी है बेसबब सी कोई
शाम है और शराब है फिर से
 
तुमने फाड़ी हैं अर्ज़ियाँ मेरी
यानि मुझको को जवाब है फिर से

तेरे लिक्खे हुए थे ख़त जिसमें 
हाथ में वो किताब है फिर से
 

 

 

Wednesday, 11 October 2023

हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है- 93-उड़ान*

 हुक्म चलता है तेरा , तेरी ही सरदारी है
तू  है पैसा, तू ख़ुदा ,  तेरी वफ़ादारी है

नंगापन भी तो बिका फ़न की तरह दुनिया में 
अब तो  जिस्मों की नुमाईश  ही अदाकारी है

कट गया  दिन तो  मेरा भीड़  में  जैसे-तैसे
लेकिन  अब  चाँद  बिना  रात बहुत  भारी है

ग़ौर   से  देख  ज़रा   बीज से अंकुर फूटा 
बस करिश्मा  सा ख़ुदा  का  ये ख़ल्क़ सारी है 

कट के गिर जाना है बस  पेड़ की तरह इक दिन 
रात -दिन काट रही वक़्त की ये आरी है 


 छोड़ दो  ,  ज़िद न करो  हार चुके हो अब तुम 
अब  कोई  दांव  न  खेलो तो  समझदारी  है

Saturday, 30 September 2023

राहों में फूल बिछा देंगे , हम दिल क़ालीन बना देंगे-92-उड़ान*

 



राहों में फूल बिछा देंगे , हम दिल क़ालीन बना देंगे
हम राह खड़े तुम आओ तो, हम सारा शह्र सजा देंगे
 
तुम अहद-ए-मोहब्बत  से  पहले , दिल को अपने राज़ी कर लो
दुनिया की फ़िक्र न करना तुम,  हम दुनिया को समझा देंगे
 
बन-ठन कर निकले हैं हम भी,  कपड़ो में इत्र लगाया है
मिल जाए कहीं तनहा वो अगर , हम दिल की बात बता देंगे
 
दुनियादारी  से अच्छी है , कुछ रौनक़  इस मैख़ाने   की
दुनिया ने जो भी दर्द दिए ,  सब सागर में दफ़ना देंगे

 मुस्का कर उसने देख लिया, फिर हंस कर हमसे बात भी की 
ये लोग बड़े ही शातिर हैं ,  अब तिल का ताड़ बना देंगे

Tuesday, 12 September 2023

ग़ज़ल-91-चल मन तू वीरानी लेकर अब जलते श्मशानों में-उड़ान *

 
 ग़ज़ल –
 
चल मन तू वीरानी लेकर  अब जलते शमशानों में
क्या रक्खा है मुर्दा बस्ती  के मुर्दा  इंसानों में
 
सारी दुनिया को  अपना  परिवार  बताने  वालों ने 
अपना ही घर बाँट दिया है  देखो  कितने ख़ानों में 
 
 रोज़ी रोटी की चिंता में  डूब रहे पढ़ कर बच्चे
 ना उम्मीदी बैठ गई है  कैसे नन्हीं जानों में 
 
घन्टों गप-छप चलती थी , घर-घर में रौनक होती थी
चुप सी छाई रहती है अब , घर , आंगन , दालानों में
 
उम्मीदों से  भर देती है , तेरे  आने  की ख़बरें
दस्तक  देने लग जाती है , धूप  इन रौशन- दानों में
 
सुख तो घर की चाय की  इक  प्याली में  मिल सकता है
लेकिन  उसको  ढूँढ रहे हम  बाज़ारों , दूकानों में
 
ज्यूँ की त्युं रहती  है  हालत , तंगी  में  जीते  हैं लोग
दिन अच्छे  लगते  हैं केवल  सरकारी एलानों  में
 
घर में  सबका अपना कमरा, लेकिन  आँगन ख़ाली है
दीवारों ने बाँट दिया घर देखो  कितने  ख़ानों में
 
ख़ुशबू  के  मरने का ज़िम्मा  मेरे सर  आता है ख़याल
मैंने  नकली  फूल  सजाये  थे घर  के  गुल-दानों में
  

Monday, 21 August 2023

ग़ज़ल -90- क़ैद था आंखों में इक ग़म का पहाड़-उड़ान *

 
क़ैद था आंखों  में  इक ग़म का पहाड़
एक आंसू  क्या गिरा ,  दरका पहाड़

बादलों से रोज़  लड़ता था  पहाड़
छिन गई हिम्मत  तो  फिर टूटा पहाड़

हमने  जब मिट्टी  जड़ों से  काट दी
फिर तो  घुटनों पर ही  आ बैठा पहाड़ 

ग़र ज़मीं  प्यासी नहीं  तो मत बरस
बादलों से इल्तिजा करता  पहाड़
 
ले गया  पानी बहा कर  कितने घर
अब पहाड़ों  पर कोई  टूटा पहाड़
 
आरियों , कुल्हाड़ियों  की  धार  ने 
थोड़ा -थोड़ा  रोज़  काटा   था पहाड़ 
 
घुल गया आँखों के पानी में  “ख़याल”
नम सी आंखों में हो ज्यूँ सुरमा पहाड़
 

Friday, 4 August 2023

ग़ज़ल -89 -अपने देस, चलो अब योगी-उड़ान *

  अपने देस,  चलो रे योगी

बदलो भेस , चलो रे योगी

 

लादो तांगा , बांधों गठरी

है आदेस , चलो रे योगी

 

हाथ कमंडल ,काँधे कम्बल

बांधो केस , चलो रे योगी

 

 संगी साथी सब बेगाने

 तज परदेस,  चलो रे योगी

 

इस वैरागी मन पर फिर से

लागी ठेस , चलो रे योगी

 

आग विरह की धधक रही है

 पी के देस , चलो रे योगी  

 

 

 

Friday, 21 July 2023

ग़ज़ल -88-जलने वाली बस्ती के दुख का अंदाज़ लगा कर देखो-उड़ान *

 

नई ग़ज़ल –सतपाल ख़याल

 

जलने वाली बस्ती के  दुख का अंदाज़  लगा  कर देखो
पल भर को तुम अपने घर का हिस्सा एक जला कर देखो


बेटी की अज़मत जाने का  दुःख पूछो तुम बाप से जाकर 

उसकी जगह पे ख़ुद को रख कर,  उसका बोझ उठा कर देखो


जिस्म के साथ जले हैं सारे ,  दुख, तकलीफ़ें, सपने,  खुशियाँ

क्या क्या  राख़ हुआ  है इसमें , अब तुम  राख़  उठा कर देखो


 
हम  चाय की  चुस्की  लेकर  पढ़  लेते हैं  मौत की ख़बरें
जिसके  घर मातम  पसरा हो ,  उसके घर  में जा कर देखो


 
अदब,  आदाब,  सलाम,  सलीक़े,  रक्खो इन सब को  कोने में
शातिर  है  कम ज़र्फ़  ज़माना , इसको  आँख  उठा कर  देखो


 
घर का मतलब क्या है “ख़याल” और  बेघर  होना क्या होता है

जिस बस्ती में  घर उजड़े हों ,  उस बस्ती में जा कर देखो

 

 

Friday, 14 July 2023

ग़ज़ल-86-तिजारत करते हैं सारे, इबादत कौन करता है-उड़ान *

तिजारत करते हैं सारे, इबादत कौन करता है
ज़रुरत खत्म होने पर मुहब्बत कौन करता है
 
सहूलत है बहुत इनमें, बहुत आराम है इनमें
    कि पिंजरा तोड़कर उड़ने की हिम्मत कौन करता है
 
ग़लत को भी गलत कहने की अब हिम्मत नहीं हममें
कि सब डरते हैं हाकिम से बगाबत कौन करता है
 
यहाँ सब लोग हैं मसरूफ़ बस रोटी कमाने में
हैं सब हर हाल में राज़ी ,शिकायत कौन करता है
 
 जिन्हें इन्साफ करना है वो शामिल हैं गुनाहों में
शिकायत कौन सुनता है ,शिकायत कौन करता है
 
कई गांठें हैं समझौतों की इन रिश्तों के धागों में
ज़रूरत से ही रिश्ता है ,मुहब्बत कौन करता है
 
कभी औलाद मांगी है , कभी दौलत , कभी रूतबा,
ख़ुदा से इश्क़ किसको है ,इबादत कौन करता है
 
बड़े दल-बल से चलता है, यहाँ पर झूठ का लश्कर
“ख़याल” अब सच की दुनिया में हिमायत कौन करता है


करतब ने भरमाई आँख

करतब ने भरमाई आँख सच को देख न पाई आँख   आवारा तितली जैसी चेहरों पर मंडराई आँख   दूर उफ़ुक़ तक दौड़ी   फिर ख़ाली लौट के आई आँख   मंज़र ,  पस-मंज़...